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क्या स्वप्न लौक ही है भारत की परिणीती? Is the dream world the only parineeti of India?

जब से मुझे होश आया है दो रास्ते मेरे सामने उपलब्ध रहे (1) तर्क – वास्तविक{आत्मविश्वास}(2) स्वपन्न – अतार्किक{ अंधविश्वास}
म. प्र. सरकार ने मेरी किशोरावस्था मे एक लाट्री चालु की थी 1रू के बदले कुछ ₹8 या ₹16 का लालच था कई साथीगण रोज अपने विषय गणित के सवालो को हल करने के बजाय उस लाट्री के गणितीय स्टेटिस्टीक्स की कापिया बनाकर अध्ययन करते थे की अब कौन सा नंबर उनका भाग्य बनाने वाला है।

उस दौर मे भी चुँकी हम तो एक सामान्य घर जिसमे एकमात्र पिता कमाने वाले और 5 भाई – बहन का भरा पुरा परिवार था को संस्कार ऐसे मिले थे की केवल अपनि मेहनत और हाथ मे उपलब्धता को ही अपना मानने की समझदार समझ विकसीत होने लगी थी फलस्वरूप अपनी विषय की तैय्यारियो मे व्यस्त रहे और मेजिकल प्राप्ति के बजाय लाँजिकल प्राप्ति की राह पर चलते चले…।

राह कठीन थी कभी- कभी साथियो को लाट्री मे जिते गये 100-200-500₹ को ईठलाकर गिनते हुवे देखकर मन मचल भी जाता था ( उम्र का तकाजा जो था) परंतु फिर भी संकल्प ने याद दिलाया की यह छलावा है भ्रम है अपन तो अपने मेहनत के मार्ग पर चलते रहो सफलता हाथ लगेगी। और अतंत:ऐसा हुवा भी कई लोग ईस लाट्री मे बरबाद भी हुवे खबरे सुनने को मिलती रहती थी कईयो के सामान बिक गये कईयो के पुरे परिवार तक ईन मेजिकल मनि मे लिप्त होते देखे गये…

ईसके बाद धिरे धिरे देश समाज मे कुछ अंधविश्वास पनपते देखे कुछ तथाकथित बाबाओ के चमत्कारो के चर्चे और उनके अनन्य भक्त मेजिक की लालच मे उनकी सेवाचाकरी और गुणगान करते देखे जाने लगे..
शनै शनै बाबाजी ठुल्लु और बाबाजी के कारनामे भी सामने आने लगे।
अब पुन: एक नेटवर्क मार्केटिंग और चिटफंड का मेजिकल प्लान परोसा गया..

ईसमे भी कई मेहनतकश ,गरिब ऐर मध्यमवर्ग के लालची लोग अपना सबकुछ खो दिये और अब फिर से मेहनत और तार्किक कामो मे जुट गये है।
हाल ही में नेटवर्क मार्केटिंग के ख्वाब में उड़ने वाले “एम वे” की प्रॉपर्टी को ED ने अटैच करके पुनः बैठे बैठे धन कमाने की लालसा पर पानी फेर दिया है।

लुभावने फ्रि और सब्सिडी के पेढ फलने फुल कर पोषित हो चुके है….इन पेड़ो की जड़े तने से भी मोटी हो चुकी है..उन्हे खोदकर काटना होगा क्योंकि इनके काटने के पहले ही इनमे पानी डाल दिया जा रहा है कुछ विदेशी शत्रु भी अपने यहां से पानी भेजकर किसी ना किसी प्रकार से डाल दे रहे है जिसमे इन कंटीले वृक्ष की छाव में प्रजा अपनी सहूलियत खोजकर फल से वंचित पीढ़ी बनाने उतारू है।

||विष्णु शर्मा||

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