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माल संस्कृती स्वाभाविकता प्राकृतिकता एवम् सहजता की शत्रु

कल शाम को कोविड काल के बाद पहली बार 13 वर्ष के बेटे के साथ शहर के शॉपिंग मॉल में जाने मिला , लिफ्ट बेसमेंट में गाड़ी खड़ी करने के उपरांत भीड़भाड़ में लिफ्ट का इंतजार कर रहे थे हमसे पहले मौका मिलने वाले लोग लिफ्ट में प्रवेश कर गए उसके परन्तु लिफ्ट ओवर लोड थी.

सब लोग एक दूसरे का मुंह तक रहे थे की कौन उतरेगा…सब मॉडर्न से दिखने वाली वेषभूषा के लोग अपने आप की मुद्रा इस प्रकार से बनाए थे की उन्हे कुछ पता ही नही है.. अस्वाभाविक रूप से वे लिफ्ट के ओवरलोड होने को अनदेखा कर रहे थे.. एक संभ्रांत सी वेशभूषा में अपने बेटे को गोद में लिए परिवार था जो अंत में लिफ्ट से बाहर निकला परन्तु उसके उपरांत भी ओवरलोड लिफ्ट चालू नही हुई… पुनः आधिनिकता को रेखांकित करते लोग निष्ठुर थे.

पुनः एक और सभ्य परिवार लिफ्ट को छोड़ बाहर आया… खेर यह लिफ्ट चली गई और हम भी अपनी बारी का इंतजार करते रहे , श्रीमति मै और मेरा बेटा.. अब पुनः लिफ्ट आई सबसे पहले हम लिफ्ट में प्रवेश किए… पुनः लिफ्ट ओवरलोड हुई..इस बार मेरी श्रीमति और मैं एक दूसरे को मुस्कुराते हुवे देख रहे थे कोई भी लिफ्ट से उतरने तैयार नहीं था.. बालमन बेटे का मन था की बहुत समय के बाद आए है लिफ्ट से जायेंगे.. अंत में श्रीमति के कहा चलो बेटा हम सीढ़ी से चलेंगे और सबसे पहले प्रवेश करने के बाद भी लिफ्ट के वजन को संतुलित करने बाहर आ गए एवम् सीढ़ियों से उपर की की मंजिल पर पहुंचे।

वर्चुअल खेलकूद
सबसे पहले बालमन बेटा हमे वर्चुअल खेल वाले स्थान पर ले गया जहा गाड़ियों की रेस से लेकर बेवजह खिलौने , चाकलेट को कैप्चर कर जीत लेने के भी खेल थे… रेस जब बच्चा करता है तो उसकी गति इतनी अधिक होती है की उसे साधना असंभव होता है तथा वे वर्चुअल कार तथा बाइक एक्सीडेंट होते हुवे आगे की ओर बढ़ती है.. लेकिन वाहन चालक कूद फांदकर, गिर कर , घिसकर, उल्टा सीधा होकर पुनः गाड़ी को दौड़ाने लगता है।( यह एक कारण है युवाओं किशोरों के एक्सीडेंट का अक्सर सुनने में आता है की फला लड़का या लड़की बाइक या कार को तेज गति से चलाते हुवे घायल हो गया या भगवान को प्यारा हो गया) यह एक प्रकार का भ्रम है जो किशोर युवाओं में उत्पन्न होता है की गाड़ी इसी प्रकार चलाना चाहिए… कुछ खेल और होते है जो जानबूझकर बेवकूफ बनने के वास्ते होते है जिस प्रकार वहा की सिनेमा में जाने पर ₹10 का पॉपकॉर्न ₹ 50 में लेकर लोग फूले नहीं समाते…यह सब मूल्यों के विश्लेषण से हमे दूर कर उल जुलूल वस्तुये अधिक मूल्य में लेकर के अपनी आत्मतुष्टि करने का षड्यंत्र सा लगता है।

वेषभूषा एवम् आचरण
माल में उपलब्ध भिड़ की वेशभूषा तो हमे मुंह फेरने पर मजबूर कर देती है। साथ ही साथ उनका आचरण भी आधुनिकता के आगोश में समाकर भद्दा हो चुका है।
किशोर युवा उन वेशभूषा एवम् आचरण से अधिक प्रभावित होते है। “अक्सर दिखावे पहनावे के जाल में महिला, किशोर जो पिता, भाई, मां , बहन या दादा के कमाए धन पर आश्रित होते है वे इन सब के जाल में जल्दी फसते है”.

क्या यह विकास है ?
क्या भारत जैसे देश जहा त्याग, तप, साधना, मर्यादा, संयम के साथ चरित्र को ही व्यक्तित्व माना जाता है वहा के सबसे उत्तम माने जाने वाले स्थान पर इस प्रकार की सोच, कृत्य, वेशभूषा आचरण एवम् होड़ आने वाली पीढ़ी को सही दिशा दे पाएगी।

Sach News Desk

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