विचार

economic package: निजी कब्जे में अनाज – the hoarding of grains can increase in the country

Edited By Shivendra Suman | नवभारत टाइम्स | Updated:

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प्रधानमंत्री द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज के अलग-अलग पहलू सामने लाने के क्रम में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को कृषि क्षेत्र से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं। इनमें सरकार का यह फैसला भी शामिल है कि पूरे देश के बाजारों तक किसानों की सीधी पहुंच सुनिश्चित करने के लिए एक केंद्रीय कानून लाया जाएगा।

वित्तमंत्री ने बताया कि सरकार आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन करके अनाज और तिलहन समेत छह प्रकार की कृषि उपजों को इससे बाहर कर देगी। परिणाम यह होगा कि किसानों के सामने इन उपजों को सरकारी खरीद केंद्रों पर ही बेचने की मजबूरी नहीं रहेगी। वित्तमंत्री ने यह भी साफ किया कि अनाज और अन्य कृषि उपजें जमा करने को लेकर अब कोई रोक-टोक नहीं रहेगी।

सरकार राष्ट्रीय आपदा, अकाल या कीमतों में असाधारण बढ़ोतरी जैसी स्थितियों में अपवादस्वरूप ही इनके स्टॉक पर कोई पाबंदी लगाएगी। इन बदलावों के संदर्भ में एक गौर करने लायक बात यह है कि निजी खरीदारों के लिए फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को मानना जरूरी होगा या नहीं, यह स्पष्ट नहीं किया गया है। लगता है, सरकार यह मानकर चल रही है कि किसान सरकारी मंडी से ज्यादा मूल्य मिलने पर ही अपनी उपज अन्य खरीदारों को बेचेंगे।

मगर व्यवहार में किसानों को अक्सर अपनी फसल कम कीमत पर बेचनी पड़ती है, जैसा हम हर साल आलू, प्याज या अन्य सब्जियों के साथ होते देखते हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य की अनिवार्यता को लेकर अगर कोई ढील दी गई तो बहुत संभव है कि किसानों की बेहतरी के लिए उठाया जा रहा यह कदम उनकी बदहाली का कारण बन जाए। इस मामले का दूसरा पहलू राष्ट्र के व्यापक हितों से जुड़ा है। वित्तमंत्री ने ठीक याद दिलाया कि आवश्यक वस्तु अधिनियम अभावों और अकालों के दौर की चीज है। हम कैसे भूल सकते हैं कि हरित क्रांति के साथ-साथ इस कड़े कानून ने भी देश को भोजन के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभाई है।

भारतीय खाद्य निगम के भंडार भरे रहने का ही नतीजा है कि अकाल या भुखमरी भारत के लिए अतीत की बात हो गई है। तमाम मुश्किलों के बीच आज भी हमारे लिए सबसे बड़ी राहत यही है कि अफ्रीका और खाड़ी देशों की तरह यहां अनाज का कोई टोटा नहीं है। आज जब हम निजी हाथों में खाद्यान्न जमा होने की इजाजत देने जा रहे हैं तब हमें यह मानकर चलना चाहिए कि आगे जब देश को इसकी सख्त जरूरत पड़ेगी, तब सरकार का इस पर कोई नियंत्रण नहीं होगा। अनाज बेचा जरूर जाएगा लेकिन कब, कहां और कितना, ये फैसले जनकल्याण की जगह मुनाफे के आधार पर लिए जाएंगे। कोई पाबंदी न रही तो इसे दुनिया के किसी भी कोने में, जहां सबसे ऊंची कीमत मिले, बेचा जा सकता है। जाहिर है, यह कोई हल्का-फुल्का मसला नहीं है। हमें देखना होगा कि किसानों का भला करने की रौ में हम कहीं फिर से भुखमरी के दौर को न्यौता न दे बैठें।

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