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coronavirus vaccine: वायरस और मुगालते – everyone’s own explanation on coronavirus

Edited By Shivendra Suman | नवभारत टाइम्स | Updated:

कोरोना वायरसकोरोना वायरस

भारत में कोरोना संक्रमितों की संख्या एक लाख की रेखा पार कर गई है। इस बीच थोड़ी राहत की बात यही है कि संसाधनों की सीमा के बावजूद हमारे यहां मौतों की संख्या विकसित देशों से कम है। याद रहे, इस मोर्चे पर अच्छा प्रदर्शन करने वाले हम अपने इलाके के अकेले देश नहीं हैं। कोरोना से जारी इस जंग में जान बचाने के मामले में पूरा साउथ एशिया दुनिया के लिए मिसाल बना हुआ है।

गरीबी, बेरोजगारी, साफ-सफाई और ऐसे तमाम मानकों पर दुनिया का पिछड़ा हिस्सा माने जाने वाले दक्षिण एशियाई देश कोरोना से होने वाली मौतों में पश्चिम के अमीर समाजों से कहीं बेहतर साबित हो रहे हैं। सीएफआर यानी कुल संक्रमित मरीजों में मृतकों के प्रतिशत की बात करें तो फ्रांस में यह 15.2 है, ब्रिटेन में 14.4 तो इटली में 14 और स्पेन में 11.9। अमेरिका में सीएफआर ज्यादातर यूरोपीय देशों से कम है लेकिन वहां भी यह 6 फीसदी है। इनके मुकाबले भारत में यह 3.3 फीसदी है जबकि पाकिस्तान में 2.2 फीसदी, बांग्लादेश में 1.5 फीसदी और श्रीलंका में महज 1 फीसदी है।

इस चमत्कार को समझने के लिए की जा रही माथापच्ची के क्रम में कई व्याख्याएं सामने आई हैं। पहली संभावना यही व्यक्त की गई कि आंकड़े सही नहीं होंगे। मगर जांच-पड़ताल के बाद इस बात पर लगभग आम राय कायम हो गई कि आंकड़े बिल्कुल सटीक न हुए तो भी उनमें इतनी गड़बड़ी नहीं हो सकती कि प्रतिशत इस कदर पलटा हुआ दिखने लगे। दूसरी व्याख्या यह सामने आई कि साउथ एशिया के सारे देशों में ज्यादातर आबादी युवा है। यूरोपीय देशों में कोरोना के चलते मौत का शिकार हुए लोगों में बड़ी संख्या ओल्डएज होम में रहने वाले बुजुर्गों की है।

एक संभावना यह भी जताई जा रही है कि इन देशों में लोगों को बचपन से ही इतने टीके पड़ चुके होते हैं कि शरीर की प्रतिरोध शक्ति बढ़ जाती है। पश्चिमी देशों में टीबी और मलेरिया जैसी बीमारियां हैं ही नहीं तो वहां टीके भी नहीं लगाए जाते। यह भी कि बचपन से तरह-तरह की बीमारियों और गंदगी के संपर्क में रहने के कारण ढेरों जीवाणुओं और विषाणुओं से टकराने का अनुभव ले चुका शरीर अनजान बीमारियों के सामने भी वैसा अनाड़ी नहीं साबित होता जैसा विकसित दुनिया के निवासियों का हो रहा है। कुछ लोग दक्षिण एशिया की कम मौतों का रहस्य यहां की जलवायु में खोज रहे हैं। उनके मुताबिक ज्यादा गर्मी में संक्रमण शुरू होने के कारण वायरस यहां अपनी पूरी संहारक शक्ति नहीं दिखा पा रहा।

बहरहाल, ये व्याख्याएं हमारे लिए निश्चिंत होने की गुंजाइश नहीं बनातीं क्योंकि इनमें से एक भी रूस पर लागू नहीं होती, जहां सीएफआर 1 प्रतिशत से भी कम है। हमें अपनी तैयारियां उस दौर को ध्यान में रखकर ही करनी होंगी, जब कोरोना के भयंकरतम रूप से हमारे सामना होगा।

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