विचार

The challenge in crisis is double and the opportunities are less

कोरोना से बचाव के लिए लगे लॉकडाउन के बाद अब देश में सबसे गंभीर आर्थिक संकट के आने की आशंका व्यक्त की जा रही है। बेरोजगारी विस्फोट का भी डर अलग बना हुआ है। इन सबके बीच मोदी सरकार ने 20 लाख करोड़ के बड़े आर्थिक पैकेज का ऐलान किया। इसके बाद कई जानकारों और विपक्षी दलों ने इस पैकेज पर यह कह कर सवाल उठाया कि इसमें प्रभावितों को फौरी तौर पर कोई सीधा लाभ नहीं दिया गया है। विपक्ष सहित एक बड़ा तबका प्रभावित लोगों के खाते में सीधे कैश ट्रांसफर की वकालत कर रहा है। लेकिन मोदी सरकार ने दूसरा रास्ता चुना है।

शुरू में जरूरी लाभ तत्काल देने के बाद 20 लाख करोड़ के पैकेज में रिफॉर्म पर अधिक फोकस किया गया है। ऐसा खुद पीएम मोदी के निर्देश पर हुआ है। पीएम मोदी के करीबियों के अनुसार वह पुराने अनुभवों और व्यावहारिक सीख का इस्तेमाल संकट के इस दौर से निकलने में कर रहे हैं। उनका मानना है कि यह लंबी लड़ाई है और दूरदृष्टि के हिसाब से बनाई गई रणनीति से देश को दोबारा खड़ा किया जा सकता है।

2001 दोहराने की कोशिश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोरोना संकट के निपटने के लिए हुई कुछ मीटिंग्स में 2001 में गुजरात के कच्छ में आए विनाशकारी भूकंप का जिक्र कर चुके हैं। देश के नाम अपने संबोधन में भी पीएम मोदी ने उस त्रासदी का जिक्र किया था। इससे वह संकेत दे चुके हैं कि कोरोना के बाद सिस्टम को पटरी पर लाने के लिए वह इस बार वैसे ही कदम उठाएंगे, जैसे उन्होंने तब उठाए थे। 2001 में गुजरात में आए विनाशकारी भूकंप के कुछ ही समय बाद नरेंद्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। 26 जनवरी 2001 को आए तीव्र भूंकप के बाद राज्य के सामने बहुत ही गंभीर संकट आ गया था। लेकिन तब जिस तरह अगले कुछ सालों में नरेंद्र मोदी की अगुआई में राज्य सरकार ने राहत का काम किया, उसकी मिसालें दी जाती थीं।

coronavirus impact: No house rent from migrant labourers, workers ...तब मोदी ने इस आपदा में अवसर देखा और पूरे इलाके को नए सिरे से जीवन दिया। यह मोदी के गुजरात मॉडल की पहली बड़ी शुरुआत थी, जिसकी चर्चा इंटरनेशनल लेवल पर हुई थी। पीएम मोदी ने पिछले दिनों उस घटना का जिक्र करते हुए कहा था कि तब भी हालात बेकाबू लगते थे और चारों ओर निराशा थी। लेकिन बाद में क्या हुआ, यह सबको पता है। तब सीएम मोदी ने कच्छ के पुनर्निमाण का जिम्मा खुद अपने हाथों में लिया था। मोदी ने अपने अनुभवों के बारे में बताया कि लोग उस इलाके में भविष्य के प्रति आशंकित थे। तब भी उनके सामने दो विकल्प थे, पहला कि लॉन्ग टर्म विजन रखें और दूसरा यह कि तत्काल कुछ राहत बांटकर आगे बढ़ जाएं। मोदी ने तब पहला रास्ता चुना था और कहा कि इलाके में इंफ्रास्ट्रक्चर की श्रृंखला बना देने से वहां सूरत बदल जाएगी।

इसी क्रम में अगले दस सालों में वह इलाका न सिर्फ अपने पैरों पर खड़ा हो गया, बल्कि पहले के मुकाबले अधिक मजबूत हो गया। भूकंप के बाद 2003 में आई आपदा से निपटने के लिए नरेंद्र मोदी ने बतौर गुजरात सीएम नया कानून बनाया और इसके तहत राज्य सरकार को कई अधिकार दे दिए। बाद में 2005 में मनमोहन सिंह की अगुआई वाली यूपीए सरकार ने उसी तर्ज पर देशव्यापी एनडीएमए का गठन किया। आज कोरोना संकट से लड़ने की बात हो या अभी आए समुद्री तूफान अम्पन से निपटने की, एनडीएमए एक बेहद कारगर नोडल एजेंसी के रूप में उभरी है।

कोरोना के बाद पीएम मोदी का 2001 का दांव दोहराने की उम्मीद रखने के पीछे आज की ग्लोबल परिस्थिति है। जानकारों के अनुसार कोरोना संकट के बाद विश्व की कई कंपनियां चीन से निकलकर नए ठिकानों की तलाश में हैं और भारत इस मौके को हाथों-हाथ ले सकता है। सरकार का दावा है कि कुछ बड़ी कंपनियों ने भारत आने के सकारात्मक संकेत भी दिए हैं। ऐसी कंपनियों को कम से कम वक्त में भारत में अपना ठिकाना बनाने के लिए न्यूनतम औपचारिकता पूरी करनी पड़े, इसके लिए नया प्रस्ताव बनाया जा रहा है। खुद पीएम मोदी ने पिछली मीटिंग में कहा था कि अगर मौजूदा संकट से निकल गए तो यहां से भारत की असली समस्या शुरू हो सकती है। कृषि से लेकर तमाम बड़े रिफॉर्म को 20 लाख करोड़ के पैकेज में इसी सोच के साथ मदद दी गई है।

आसान नहीं हैं रास्ते
नरेन्द्र मोदी ने जरूर बीस साल पुराने अनुभवों के आधार पर मौजूदा संकट से निकलने का संकेत दिया है, लेकिन इस बार हालात तो अलग हैं ही, समीकरण भी अलग हैं। इसके अलावा संकट का प्रभाव क्षेत्र भी अलग है। भूंकप के बाद कुछ खास जिलों तक ही फोकस करना था, मगर कोरोना में पूरे देश के पुनर्निर्माण की चुनौती है। अब कई राज्यों में दूसरे दलों की सरकार है और वे अपने हिसाब से फैसले लेते हैं। फिर कोरोना के साथ आर्थिक संकट ऐसे समय में आया है, जब पहले से ही अर्थव्यवस्था बहुत अच्छी सूरत में नहीं थी। जीडीपी ग्रोथ लगातार नीचे जा रही थी। ऐसे में इस बार चुनौती की कई परतें हैं तो साधन और विकल्प काफी सीमित हो चुके हैं।

फिर यह लड़ाई भी लंबी और उलझी हुई है। कुल मिलाकर नरेंद्र मोदी के दो दशकों के प्रशासनिक सफर में कोरोना की महामारी सबसे बड़ी चुनौती बन कर सामने आई है। इसमें पहले दौर में वह जीतते भी दिखे, जब उन्होंने लॉकडाउन को प्रभावी तरीके से लागू करने में सफलता पाई। तमाम शुरुआती सर्वे में उनके नेतृत्व की लोकप्रियता बढ़ने की बात भी कही गई। लेकिन असली चुनौती अब शुरू होने वाली है। इस महामारी को दूसरे विश्व युद्ध के बाद का सबसे बड़ा क्राइसिस माना जा रहा है, और अभी तो इस बारे में यह भी साफ नहीं है कि यह कब तक रहेगी। ऐसे हालात में न सिर्फ उनके नेतृत्व बल्कि देश की भी परीक्षा अगले कुछ महीनों तक होती रहेगी, जिसका रिजल्ट आने वाले समय में दिखेगा।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

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