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पाकिस्तान डायरी: 'तुम कैसे मसीहा हो, दवा क्यों नहीं देते?'



पाकिस्तान में आजकल दवाइयों के दाम बढ़ने को लेकर कोहराम मचा है. जीवन रक्षक और अन्य सभी तरह की दवाओं के दामों में 9 से 15 प्रतिशत वृद्धि को मंजूरी दे दी गई है. सभी पाकिस्तानी उर्दू अखबार इस कदम को जनता विरोधी और खासकर गरीब तबकों के लिए घातक करार दे रहे हैं.

अखबारों ने दवा कंपनियों की इस दलील को भी प्रमुखता से अपने संपादकीयों में जगह दी है कि बिजली और डीजल-पेट्रोल के बढ़ते दाम, दवाओं में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल और उनकी पैकिंग पर बढ़ती लागत और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पाकिस्तान रुपये की कीमत में लगातार गिरावट के कारण कीमतें बढ़ाना उनके लिए आखिरी विकल्प था. उनका कहना है कि कीमतें नहीं बढ़ाते तो देश में दवाओं की किल्लत हो जाती. लेकिन पाकिस्तानी मीडिया सवाल कर रहा है कि जनता को राहत देने के नाम पर सत्ता में आई इमरान खान सरकार आखिर क्या कर रही है.

जख्मों पर तेजाब

जसारत ने पाकिस्तान की ड्रग्स रेग्युलेट्री अथॉरिटी के इस बयान पर तंज किया है कि मरीजों और देश के व्यापक हित में कीमतें बढ़ाने का कदम उठाया गया है. अखबार कहता है कि अगर दाम बढ़ाना जनता के हित में है तो इजाफे को सिर्फ 15 फीसदी तक ही क्यों सीमित रखा गया है? अखबार ने अथॉरिटी के इस दावे पर भी सवाल उठाया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुकाबले पाकिस्तान में कीमतें अब भी कम हैं.

अखबार के मुताबिक पड़ोसी देश भारत में दवाओं के दाम पाकिस्तान के मुकाबले ना सिर्फ कम हैं बल्कि दवाओं की गुणवत्ता भी बेहतर है और इसीलिए कई दवाएं वहां से स्मगलिंग हो कर आती हैं. अखबार लिखता है कि ऐसे सभी कदम देश के हित में उठाए जाते हैं, लेकिन असल में यह गरीबों के जख्मों पर नमक नहीं बल्कि तेजाब झिड़कना है. अखबार की टिप्पणी है कि दवाओं की कीमतों में इजाफे के लिए इमरान खान सरकार पिछली सरकार को जिम्मेदार करार दे सकती है लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सरकार पांच साल तक यही राग अलापती रहेगी.

प्रतीकात्मक तस्वीर

रोजनामा दुनिया लिखता है कि डॉलर की कीमतों में वृद्धि को देखते हुए दवा कंपनियों ने कीमतों में 40 फीसदी इजाफे की मांग की थी और अब उनकी मांग कुछ हद तक पूरी भी कर दी गई है. अखबार के मुताबिक दवाइयों के दामों में वृद्धि पर लोगों ने गहरी नाराजगी जताई है और पाकिस्तान में जीवन रक्षक दवाओं की किल्लत हो चुकी है.

अखबार ने मेडिकल स्टोर मालिकों के हवाले से लिखा है कि कुछ दवा कंपनियों ने तो मंजूरी से पहले ही कीमतें बढ़ा रखी हैं. अखबार की टिप्पणी है कि पाकिस्तान में लगातार बढ़ने वाली महंगाई से ना तो गरीब सुरक्षित है और ना ही अमीर, इसीलिए इसका कुछ किया जाना चाहिए.

बुनियादी जिम्मेदारी

इसी विषय पर रोजनामा जंग का संपादकीय है- दवाएं महंगी, जनता के लिए नई मुश्किल. अखबार लिखता है कि गरीबी, बेरोजगारी और दिन प्रति दिन महंगाई की चक्की में पिसते, इलाज और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं को तरसरते करोड़ों पाकिस्तानियों के लिए दवा की कीमतें बढ़ाने का फैसला मुश्किलें बढ़ाने वाला होगा. अखबार के मुताबिक यह कहकर गरीबों के जख्मों पर नमक भी छिड़का गया कि इस वृद्धि के बावजूद पाकिस्तान में दवाओं के दाम अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर से कम हैं.

अखबार के मुताबिक यह बात कहते हुए याद रखना चाहिए थी कि ज्यादातर देशों में नागरिकों को इलाज और स्वास्थ्य देखभाल की सुविधाएं मुहैया कराना सरकार की बुनियादी जिम्मेदारियों में शामिल होता है और संसाधनों की कमी की वजह से कोई नागरिक इन सुविधाओं से वंचित नहीं रहता. अखबार की टिप्पणी है कि बरसों से दवाओं की कीमतों में वृद्धि ना होने के दावों के बावजूद आम उपभोक्ताओं का यह अनुभव है कि आए दिन दवाओं की किल्लत पैदा कर उनकी कीमतें बढ़ाई जाती रही हैं.

नवा ए वक्त ने अपने संपादकीय को शीर्षक दिया है- दवाइयों की कीमतों में इजाफा, गरीबों के लिए जानलेवा. अखबार लिखता है कि इमरान खान की पार्टी पीटीआई के सत्ता में आने के बाद से देश में मंहगाई के तूफान शुरू हो गए. अखबार के मुताबिक, ड्रग्स अथॉरिटी और सरकारी हल्के कह रहे हैं कि उनके सामने दो ही रास्ते बचे थे- या तो दवाओं की कीमतों में इजाफा किया जाए या फिर फैक्ट्रियों पर ताला लगाया जाए. अखबार की राय में, हो सकता है कि हालात वाकई इस मोड़ पर आ गए हों कि इस फैसले के बिना कोई चारा ना हो लेकिन कम से कम इतना तो सोचा जाना चाहिए था कि आम आदमी और खास कर कम आमदनी वाले लोगों के लिए यह फैसला जानलेवा साबित होगा. अखबार की दलील है कि जनता के हित में इस फैसले को वापस लिया जाना चाहिए.

दर्दनाक हकीकत

एक्सप्रेस लिखता है कि देश के दूरदराज के इलाकों या फिर शहरों में रहने वाले गरीब और पिछड़े तबके के जो मरीज दवाएं खरीदने की हैसियत नहीं रखते, वे कहां जाएं. पाकिस्तान में सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा का जिक्र करते हुए अखबार कहता है कि वहां दीन दुखियों के साथ बुरा सलूक जारी है, जो गरीब सेहत की भीख मांगता है, वह गरीबी से तिलमिला कर पूछता है, ‘तुम कैसे मसीहा हो, दवा क्यों नहीं देते?’

अखबार की राय है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में जबरदस्त राहत दिए जाने की जरूरत है क्योंकि इलाज की कमी देश के गरीब वर्गों के लिए एक दर्दनाक हकीकत बन रही है और इस पर ध्यान देने की जरूरत है.

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