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मास्टर प्लान 2041: क्या होगा फायदा-नुकसान जानें आसान शब्दों में

डीडीए ने का ड्राफ्ट जारी कर दिया है। इसमें दिल्ली को बेहतर बनाने के लिए क्या प्रावधान हैं? पिछले और इस बार के प्लान में क्या अंतर है और इस बार ऐसा क्या किया गया है, जिससे विकास के कामों में जटिलताएं कम होंगी। इन मामलों पर एनबीटी ने बात की
डीडीए के रिटायर कमिश्नर (प्लानिंग) ए.के. जैन से…

मास्टर प्लान 2041 का ड्राफ्ट सार्वजनिक हो गया है। इसे किस तरह से देखते हैं?
मास्टर प्लान एक तरह से अगले 20 वर्ष का विजन डॉक्यूमेंट होता है। इसे हर 20 वर्ष में इसलिए बनाया जाता है ताकि जरूरत के मुताबिक उसे बनाया जा सके। जैसे अब दिल्ली में प्रदूषण की समस्या है। अब हेल्थ ओरिएंडेट सुविधाओं की जरूरत है। सड़क और निर्माण की तकनीक बदल गई है। ऐसे में जरूरतों के मुताबिक मास्टर प्लान को तैयार किया जाता है। इसके अलावा देश की जीडीपी में दिल्ली का सात फीसदी का योगदान है। ऐसे में ये योगदान भी बढ़े और लोगों को सुविधाएं भी मिल सकें, ये भी मास्टर प्लान का मकसद होता है।

लेकिन दिल्ली में अब जमीन तो काफी कम बची है। ऐसे में नई प्लानिंग के नजरिए से ये प्लान कितना सार्थक होगा ?ऐसा नहीं है। दिल्ली में अभी भी लगभग तीन सौ वर्ग किमी का एरिया ऐसा है, जहां जमीन खाली है। हमें अगले 20 साल में दिल्ली में 34 लाख मकानों की जरूरत होगी। इनमें से 17 लाख मकान तो इस खाली जमीन से ही आएंगे और बाकी 17 लाख मकान, रिडेवपलमेंट स्कीम के जरिए होंगे। कई पुराने इलाकों को रिडेवलप करके वहां नए मकान बनाए जा सकते हैं। इसी तरह से मास्टर प्लान में सिर्फ जमीन के लिहाज से ही नहीं बल्कि शहर की जरूरत के लिहाज से भी प्लानिंग की जाती है ताकि शहर सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ सके।

लेकिन क्या वाकई मास्टर प्लान पर पूरी तरह से अमल हो पाता है?पिछले मास्टर प्लान को बनाते समय सर्वे किया गया था। उस वक्त पता चला था कि एनडीएमसी एरिया में तो 80 से 90 फीसदी तक मास्टर प्लान पर अमल हुआ और बाकी दिल्ली में लगभग 50 फीसदी पर ही अमल हो पाया। लेकिन यमुनापार एरिया में सिर्फ एक तिहाई हिस्से पर ही अमल हो पाया। हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये माना जाता है कि इस तरह के प्लान 70 से 75 फीसदी पर ही अमल हो पाता है।

लेकिन यमुनापार में इसका सिर्फ 30 फीसदी ही लागू होने की क्या वजह थी ?एक तो इस एरिया में सिविक एजेंसियों के तालमेल में कमी थी। अलग-अलग एजेंसियों को कुछ काम करने होते हैं लेकिन वे नहीं हो पाए। इसके अलावा एक वजह ये भी थी कि लोकल एरिया प्लान नहीं बन पाए थे। दरअसल, पिछले मास्टर प्लान के मुताबिक दिल्ली के सभी 272 वार्ड के स्तर पर लोकल एरिया प्लान बनने थे लेकिन ये दिल्ली में बन ही नहीं पाए।

लोकल एरिया प्लान क्यों नहीं बन पाए ?दरअसल, डीडीए ने तो मास्टर प्लान ओर जोनल प्लान बना दिए लेकिन लोकल एरिया प्लान नगर निगमों को बनाने थे और इसके लिए म्युनिसिपल एक्ट में संशोधन किया जाना था ताकि लोकल एरिया प्लान की व्यवस्था की जाए लेकिन एक्ट में ये संशोधन ही नहीं हो पाया।

तो इस बार भी ये दिक्कत होगी?इस बार तो मास्टर प्लान में लोकल एरिया प्लान के प्रावधान को ही हटा दिया है। मुझे लगता है कि ये नहीं होना चाहिए क्योंकि मास्टर प्लान तो एक तरह से कॉन्सेप्ट प्लान होता है। लोगों तक इसका फायदा हो इसके लिए लोकल एरिया प्लान जरूर होना चाहिए। इस बार शायद जिन लोगों ने मास्टर प्लान बनाया, उन्हें इसकी जरूरत महसूस नहीं हुई।

इस बार के मास्टर प्लान में पर्यावरण ओर रेंटल पॉलिसी पर भी जोर दिया गया है?इस बार पर्यावरण, ट्रांसपोर्ट, इलेक्ट्रिक वीकल और नाइट लाइफ पर जोर दिया गया है। ये शहर की जरूरत भी है। इसके अलावा रेंट पॉलिसी इसलिए जरूरी है, क्योंकि दिल्ली में 20 फीसदी से अधिक लोग किराए के मकानों में रहते हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या में लोग पढ़ने, ट्रेनिंग और अन्य कामकाज के लिए दिल्ली आकर रहते हें। ऐसे लोगों के लिए डोरमेटरी, गेस्ट हाउस आदि बनाने के लिए पॉलिसी लाई जा सकती है। इसके अलावा यहां डीडीए को भी अपने मकानों के साइज पर फोकस करना होगा। अब 60 के दशक जैसे हालात नहीं हैं। बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जिनकी क्षमता अच्छा मकान खरीदने की है। जबकि डीडीए के हाल के वर्षों में बहुत छोटे मकान बने हैं। जिसकी वजह से लोगों ने उन्हें पसंद नहीं किया। जो भी मकान खरीदता है, वह कम से कम अपनी एक जनरेशन को ध्यान में रखकर खरीदता है इसलिए जरूरत है कि डीडीए ईडब्ल्यूएस और एलआईजी कैटेगरी के मकान भी 60 वर्ग मीटर से छोटे न बनाए।

ड्राफ्ट में अनधिकृत कालोानियों के लिए लैंड पूलिंग जैसे सिस्टम की बात कही गई है। क्या आपको लगता है कि दिल्ली की अनधिकृत कॉलोनियों के लिए ये व्यावहारिक होगा ?टर्की में मैनें देखा है कि इस तरह का प्रयोग कामयाब हुआ हे। इसके लिए सरकार को आगे आना चाहिए। लोग अपने मकानों की जमीन को जोड़ लें और उसमें से एक तिहाई जमीन सार्वजनिक सुविधाओं के लिए रख दें और फिर बहुमंजिले मकान बना लें। इससे कॉलोनी सुनियोजित हो जाएगी। इसके लिए लोगों को कॉपरेटिव सोसायटी बनानी होगी। इसके लिए मास्टर प्लान में एफएआर की भी व्यवस्था है। बढ़े हुए एफएआर से ही मकानों के निर्माण की लागत भी निकल आएगी।

ड्राफ्ट में मल्टीपल एजेंसियों की समस्या को दूर करने के लिए एक नोडल एजेंसी की भी बात कही गई है ?ट्रांसपोर्ट के लिए ये सोचा गया है। अभी यूटीपैक है लेकिन ये पूरा सॉल्यूशन नहीं है। अभी दिल्ली में ट्रांसपोर्ट की कई एजेंसियां हैं। मेट्रो, रेलवे, एनएचएआई, पीडब्ल्यूडी, ट्रांसपोर्ट आदि को कोर्डिनेट करने के लिए अर्बन मास ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (उम्टा) बनाने पर सोचा गया है। नैशनल अर्बन ट्रांसपोर्ट पॉलिसी 2006 में भी इस बारे में कहा गया था। लेकिन उसके बाद मामला अटक गया कि उम्टा केंद्र सरकार के अधीन रहे या दिल्ली सरकार के। अब फिर से उम्टा का प्रस्ताव शामिल गया है। ट्रांसपोर्ट के अलावा दूसरे विभागों के बीच तालमेल के लिए डिजिटल सिस्टम की बात की गई है। 20 इंडीकेटर्स भी बनाए गए हैं, जो सभी विभागों के कामकाज की मॉनीटरिंग होती रहे।

डीडीए ने अपने गठन के बाद शुरुआत में जो फ्लैटस बनाए थे, उनकी उम्र भी पूरी हो रही होगी। उन्हें दोबारा बनाने की जरूरत होगी। इसके बारे में मास्टर प्लान में कुछ सोचा गया है?
अपनी उम्र पूरी कर चुके डीडीए फ्लैटस को लेकर भी मास्टर प्लान के ड्राफ्ट में रिडेवलपमेंट की बात कही गई है। रिडेवलपमेंट करने के लिए वही तरीका होगा, जो अभी सरकारी कॉलोनियों के रिडेवलपमेंट के लिए अपनाया गया है। इसके तहत डीडीए की इसी कॉलोनी में एफएआर बढ़ जाएगा। इससे कुछ जमीन को कमर्शल के तौर पर यूज करके पैसा एकत्र किया जा सकता है। डीडीए आगे बढ़कर किसी एक कॉलोनी को प्रयोग के तौर पर ऐसा कर सकता है ताकि बाकी कॉलोनियों में उस तरह का प्रयोग किया जा सके।

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