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योगी, अनुप्रिया, निषाद… ताबड़तोड़ बैठकें और अब ये अटकलें, शाह के मन में क्या चल रहा है?

मनीष श्रीवास्‍तव, लखनऊ
बीजेपी अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सारे कील-कांटे दुरुस्त करने में जुट गई है। इसकी कमान खुद कभी यूपी के प्रभारी रह चुके और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने खुद संभाल ली है। गुरुवार को यूपी सरकार और संगठन को लेकर चल रही अटकलबाजी को विराम देने के लिए उन्होंने खुद सीएम योगी आदित्यनाथ से बात की। साथ ही यूपी में गठबंधन के दो नेताओं अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल और निषाद पार्टी के मुखिया डॉ. संजय निषाद के साथ बैठकर उनकी भी बात सुनी।

मंत्रिमंडल विस्तार, खाली पद भरे जाएंगेसूत्रों का कहना है कि दिल्ली में चल रही पूरी कवायद के बाद यह तय हो गया है कि यूपी में जल्द मंत्रिमंडल विस्तार होगा और आयोग-निगमों में खाली पद भरे जाएंगे। मंत्रिमंडल में सात सीटें खाली हैं, जिन पर अब तक खुद को उपेक्षित बताने वाली अपना दल (एस) और निषाद पार्टी भी दावेदारी जता रही है। दोनों को केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी एक सीट के साथ आयोग और निगमों में अपने कार्यकर्ताओं का मनोनयन चाहिए।

आयोग-निगमों में अल्पसंख्यक आयोग, पिछड़ा वर्ग आयोग और अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्षों को मिलाकर करीब 110 पद खाली हैं। बड़े तीन आयोगों के नामों को लेकर चर्चा भी हो चुकी है। वहीं, मंत्रिमंडल में गठबंधन के दावेदारों के साथ कांग्रेस से बीजेपी में आए जितिन प्रसाद और एमएलसी एके शर्मा के नाम भी शामिल हैं। यूपी में चार एमएलसी सीटें खाली हो रही हैं, इन पर भी दावेदारी है। सूत्रों का कहना है कि शाह ने ने ‘बैकलॉग’ खत्म करने के साथ यूपी की चुनावी तैयारियों को धार देने का रास्ता सुझा दिया है। यूपी बीजेपी इसी पर आगे बढ़ेगी।

विधानसभा प्रभारी-संयोजकों की नियुक्ति जल्दीअपनी चुनावी तैयारियों को छह महीने पहले से तेज कर देने वाली बीजेपी ने विधानसभा प्रभारी और चुनाव संयोजकों की नियुक्ति की तैयारी भी शुरू कर दी है। जिलों से इसके लिए नाम मांगे गए हैं। बीजेपी संगठन में भी मोर्चों, प्रकोष्ठों के पद खाली हैं। इन पर भी नियुक्ति की कवायद तेज कर दी गई है।

शाह के लिए यूपी है महत्वपूर्णयूपी बीजेपी के साथ अमित शाह के लिए काफी महत्वपूर्ण है। यूपी में बीजेपी को फर्श से अर्श पर पहुंचाने का श्रेय शाह को ही जाता है। 2013 में जब उन्हें प्रभारी बनाकर भेजा गया था, तब यूपी में पार्टी के 50 से भी कम विधायक और 10 सांसद थे। गुटबाजी भी चरम पर थी। 2014 के चुनाव से पहले शाह ने ही यह सब खत्म किया। यूपी में गठबंधन का प्रयोग भी उनकी ही देन थी।

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