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कुशवाहा से लालजी… 'सिपहसलारों' पर गाज गिराकर BSP को क्यों कमजोर कर रही माया?

लखनऊ
यूपी में 2007 में जब बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) पहली बार सत्ता में आई तो उसके पीछे एक बड़ा कारण दलित, पिछड़ा और ब्राह्मण गठजोड़ था। मगर 2012 में सत्ता से बाहर होने के बाद पार्टी को शिखर पहुंचाने वाले इन जातियों के नेताओं ने बीएसपी से किनारा करना शुरू किया, तो पार्टी लगातार कमजोर होती गई। अब गुरुवार को बीएसपी ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते 2 और विधायकों लाल जी वर्मा और राम अचल राजभर को निष्कासित कर दिया।

इसमें खासतौर पर 2012 के बाद पिछड़ी जाति के बड़े नेताओं ने या तो बीएसपी से खुद ही किनारा कर लिया या फिर पार्टी ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसका नुकसान पार्टी को उठाना पड़ा। शायद यही वजह रही कि 2012 में सत्ता से बाहर हुई पार्टी 2014 के लोकसभा चुनावों में एक भी सीट नहीं जीत सकी।

बाबू सिंह कुशवाहा से लेकर स्वामी प्रसाद मौर्या तक
2011 में एनएचएम घोटाले में नाम आने के बाद बीएसपी सरकार में मंत्री रहे बाबू सिंह कुशवाहा पर जब भ्रष्टाचार के आरोप लगे, तो पार्टी ने उन्हें मंत्री पद से हटा दिया। 2012 के विधानसभा चुनावों में कुशवाहा खुद पार्टी से अलग हो गए।

2017 के विधानसभा चुनावों से पहले तत्कालीन विधानसभा में विपक्ष के नेता स्वामी प्रसाद मौर्या ने पार्टी से इस्तीफा देकर बीजेपी जॉइन कर ली। इसका असर पार्टी की परफॉर्मेंस पर साफ दिखा और विधानसभा में पार्टी के सदस्यों की संख्या 19 रह गई।

बीएसपी के 18 विधायकों में 11 बागी
2017 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को 19 सीटें मिलीं लेकिन बाद में एक विधायक रितेश पांडे ने 2019 में लोकसभा चुनाव लड़ा और जीता। इसके बाद विधानसभा में ये सीट भी बीएसपी के हाथ से निकल गई। राज्यसभा चुनावों में पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने पर बीएसपी ने सात विधायकों को निलंबित कर दिया। इससे पहले दो विधायकों को पार्टी पहले ही निलंबित कर चुकी थी। अब पार्टी में विधायकों की संख्या 7 ही बची है।

ये 9 विधायक पहले से ही निलंबित
असलम राइनी ( भिनगा-श्रावस्ती), असलम अली (धौलाना-हापुड़), मुजतबा सिद्दीकी (प्रतापपुर-इलाहाबाद), – हाकिम लाल बिंद (हांडिया- प्रयागराज), हरगोविंद भार्गव (सिधौली-सीतापुर), सुषमा पटेल( मुंगरा बादशाहपुर), वंदना सिंह -( सगड़ी-आजमगढ़), अनिल सिंह (पुरवा-उन्नाव), रामवीर उपाध्याय (सादाबाद-हाथरस)

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