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Hamar Chhattisgarh

हैप्पी मदर्स डे केलो

नदी पूज्यनीया होती हैं इनकी पूजा अस्वाभाविक नहीं है, ऐसी पूजा तो प्रतिदिन होनी चाहिए। हमारे देश के अनेक जगहों पर इस तरह की पूजा संपन्न भी की जाती हैं। इसी कड़ी में हमारे जिले की जीवन रेखा केलो नदी भी पूजा और श्रद्धा की हकदार है, इसके किनारे बसे सैकड़ों गांव और शहर इससे अपनी जरूरतें पूरी करते हैं। वैसे ही केलो नदी की अपनी जरूरत होती है अगर केलो नदी हमें जीवन देती है तो उसके अस्तित्व को बचाए रखने का दायित्व किसी और का नहीं बल्कि हमारा ही है। साल के एक दिन नदी की पूजा और आरती करते हुए हमें इस बात पर भी सोचना होगा कि साल के शेष दिनों में हमारा बर्ताव उसके प्रति क्या है? यह जगजाहिर है कि केलो का अस्तित्व खतरे में है औऱ इसे बचाने की एक ईमानदार कोशिश हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता में होनी चाहिए। इसलिए हमें अपने आप से सवाल पूछना होगा कि केलो को इस दुर्दशाग्रस्त अवस्था में लाने में हमारी अपनी भूमिका क्या रही है? यहां जब हम अपनी बात करते हैं तो उसका दूसरा अर्थ हमारे जनप्रतिनिधियों से होता है जिन्हें हम विश्वास के साथ पंचायतों से लेकर संसद तक भेजते हैं कि वे हमारे हित-अहित का ध्यान रखें और अपने उपलब्ध संसाधनों के माध्यम से हमारे दुख और तकलीफों का समाधान निकालें। महज एक दिन की महाआरती और शेष दिन की उदासीनता एक ज्वलंत मुद्दा है उन सभी के लिए।

अब यदि बात केलो नदी की करें तो इतिहास यह बताता है कि लैलूंगा के पहाड़ लुड़ेग नामक ग्राम की घाटियों से निकली यह नदी लगभग 190 किलोमीटर का रास्ता तय करती है। जानकार यह भी बताते हैं कि किसी समय यह मध्य भारत की एक स्वच्छ जल वाली नदी थी क्योंकि जल शुद्धिकरण हेतु जितने खनिजों की आवश्यकता होती है वह सब नैसर्गिक रूप से इसके प्रवाह के रास्ते में मौजूद थे। आज भी रायगढ़ के कई वृद्ध या बुजुर्ग स्त्रियां गवाह होंगे कि कार्तिक माह में जब वे पूजन और दीप प्रवाह के लिए केलो के घाट में जाती थीं तो तकरीबन ऐसा प्रतीत होता था कि स्वंय आसमान जमीन पर आ गया हो। साफ स्वच्छ केलो में तैरते सैकड़ों प्रज्जवलित दीप की छटा रमणीय होती थी। यह कोई अतीत की नहीं महज 20-25 वर्ष पूर्व की बात है। औद्योगिकीकरण के चलते और उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट को केलो में प्रवाहित करने के चलते केलो प्रदूषित होती ही गई और यह सिलसिला आज भी निरंतर जारी है। जनप्रतिनिधि आए-गए उनके द्वारा लुभावने वादों का सपना भी बुना गया लेकिन कमी जो रही वह थी एक फौलादी ईमानदार कोशिश की। एक बार निगम ने कोष्टा पारा में 2010 के आसपास वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाया था जो बमुश्किल 10 दिन चला होगा और उसके बाद आजतक बंद है। 14 जनवरी को संपन्न होने जा रहे इस मेगा शो की तैयारी महज उसके तीन चार तीन पहले और शो के दो-तीन दिन बाद तक सिमट कर रह जाती है।

यदि हम कहें कि केलो आज मरणासन्न अवस्था में है तो यह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी इसमें रहने वाली कई जलचर प्रजातियां विलुप्ति हो चुकी हैं और जो मौजूद हैं वो तकरीबन विलुप्त के कगार पर है। नदी में मौजूदा पानी की स्थिति यह है कि नहाने पर कई चर्म रोगों का खतरा है। इसकी दशा अब भी न संभली तो आने वाले समय में रायगढ़ शहर में जल संकट की नौबत आ सकती है। लाखों रुपये खर्च कर हजारों की भीड़ इकट्ठी कर ऐसे मेगा शो के आयोजन के माध्यम से हम अपनी उत्सवधर्मी मानसिकता का परिचय देकर भले ही ताली बटोर लें लेकिन इसे केलो के साथ एक क्रूर मजाक कहना होगा, यह मेरी अपनी राय है। बल्कि, मेरी तो गुजारिश है यहां के जनप्रतिनिधियों और जागरूक नागरिकों से कि वे बिलासपुर अरपा नदी के संरक्षण के लिए गठित अरपा विकास प्राधिकरण की तरह केलो विकास प्राधिकरण बनाने की मांग शासन के पास रखे ताकि अंतिम सांसे ले रही केलो को नया जीवन मिल सके।

तब तक के लिए मनाने और देखने वालों की तरफ से हैप्पी मदर्स डे केलो मईया…364 दिन बाद फिर मिलेंगे हालत शायद और बदतर हो जाए या कुछ सुधर भी जाए। हम दोनों का मिलना तो नियति है।

(लेखिका वरिष्ठ शिक्षाविद और समाजसेवी हैं, लेख में उनके निजी विचार हैं)

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