Hamar Chhattisgarh

छत्तीसगढ़ : दाद के नए रूप का बढ़ा प्रकोप, हर दिन सामने आ रहे सौ से ज्यादा मामले

रायपुर। छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े चिकित्सा केंद्र, आंबेडकर अस्पताल के त्वचा रोग विभाग में पिछले दो वर्ष में पहुंचे त्वचा रोग के मामलों में 50 फीसद दाद के हैं। विभाग में हर दिन 200 से 250 मरीज पहुंच रहे हैं। इनमें 100 से 125 मरीज दाद की नई किस्म ट्राईकोफायटान मेंटाग्रोफाइट्स इन्फेक्शन के शिकार होते हैं। दाद के इस रूप के एक से दूसरे व्यक्ति में फैलाव की गति लगभग दोगुनी है। पीड़ित के संपर्क में आने वाले परिवार के सदस्य जल्द चपेट में आ जा रहे हैं। मुश्किल इसलिए भी गंभीर है कि पुराना दाद एक से दो महीने में ठीक हो जाता था, लेकिन इसके नए रूप के शिकार लोगों को चार से छह महीने तक लगातार इलाज करवाना पड़ता है।

70-80 फीसद तक ज्यादा आक्रामक है दाद का नया रूप

डा. भीमराव आंबेडकर मेमोरियल अस्पताल के त्वचा रोग विभाग के अध्यक्ष डा. मृत्युंजय सिंह ने बताया कि पिछले दो वर्षों से दाद के रूप में परिवर्तन देखने को मिल रहा है। दो वर्ष पूर्व दाद (टिनिआ) जिसे ट्राईकोफायटान रब्रम कहा जाता था वह सामान्य इलाज से महीने भर में ठीक हो जाता था। अब यह दाद ट्राईकोफायटान मेंटाग्रोफाइट्स के रूप में अधिक सामने आ रहा है। दाद का यह नया रूप 70 से 80 फीसद अधिक आक्रामक है।

दाद की बीमारी को समझें

चिकित्सक के अनुसार दाद फंगल इन्फेक्शन के कारण होता है। जिस हिस्से में दाद होता है वहां त्वचा पर चकत्ते पड़ जाते हैं। इसमें अत्यधिक खुजली और जलन होती है। बीमारी बढ़ने पर दाद घाव का रूप ले लेता है, जो शरीर के अन्य हिस्सों में भी फैल सकता है। यह जांघ के बीच में, पेट व कमर के नीचे, हाथ में अधिक होता है। फैलने का कारण पीड़ित के उपयोग किए हुए कपड़े, साबुन व अन्य सामग्री का इस्तेमाल करने से दाद फैलता है।

बचाव के उपाय

दाद या किसी तरह के त्वचा से संबंधित इन्फेक्शन पर सेल्फ ट्रीटमेंट न लें।
गीला कपड़ा न पहनें
संक्रमित व्यक्ति कपड़े को हर बार धोकर पहनें व अलग रखें।
अपना साबुन, कपड़ा व अन्य उपयोगी सामग्री अलग रखें।
हर रोज साबुन से नहाएं, शरीर को साफ-सुथरा रखें।
आंबेडकर अस्पताल के त्वचारोग विभाग के विभागाध्यक्ष डा. मृत्युंजय सिंह ने कहा, ‘त्वचा रोग की ओपीडी में 50 फीसद मरीज दाद की नई किस्म ट्राइकोफायटान मेंटाग्रोफाइट्स इन्फेक्शन के हैं। जागरूकता व जानकारी के अभाव में लोग देर से अस्पताल पहुंचते हैं। तब तक पीडि़त के परिवार के अन्य लोग भी बीमारी की चपेट में आ जाते हैं।’

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